देश दौड़ेगा बुलेट ट्रेन से, लेकिन कानपुर फिर रह गया प्लेटफॉर्म पर- औद्योगिक शहर की अनदेखी पर उठे सवाल..अभय त्रिपाठी

कानपुर। केंद्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को पश्चिम बंगाल में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिल्ली से वाराणसी होते हुए सिलीगुड़ी तक प्रस्तावित हाईस्पीड बुलेट ट्रेन कॉरिडोर को लेकर बड़ा ऐलान किया। रेल मंत्री ने बताया कि देश की दूसरी बुलेट ट्रेन परियोजना के रूप में इस कॉरिडोर को विकसित किया जाएगा, जिससे दिल्ली से सिलीगुड़ी तक का लगभग 1500 किलोमीटर का सफर मात्र छह घंटे में पूरा किया जा सकेगा। यह परियोजना उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को आधुनिक हाईस्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ने वाली है। लेकिन इस घोषणा के साथ ही कानपुर में एक बार फिर विकास योजनाओं में उपेक्षा को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। वजह यह है कि दिल्ली-वाराणसी और दिल्ली-सिलीगुड़ी, दोनों प्रस्तावित बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के रूट में कानपुर को शामिल नहीं किया गया है। जबकि उत्तर प्रदेश के जिन शहरों को इस परियोजना का लाभ मिलेगा, उनमें लखनऊ, अयोध्या, रायबरेली, प्रयागराज और वाराणसी शामिल हैं।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि कानपुर केवल उत्तर प्रदेश का एक बड़ा शहर नहीं, बल्कि देश के प्रमुख औद्योगिक, शैक्षणिक और परिवहन केंद्रों में गिना जाता है। देश के सबसे व्यस्त रेल मार्ग दिल्ली-हावड़ा कॉरिडोर पर स्थित कानपुर सेंट्रल से प्रतिदिन सैकड़ों ट्रेनें गुजरती हैं और लाखों यात्रियों की आवाजाही होती है। रेलवे के लिहाज से यह उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण जंक्शनों में से एक माना जाता है। औद्योगिक दृष्टि से देखें तो कानपुर चमड़ा उद्योग, होजरी, वस्त्र निर्माण, प्लास्टिक उत्पाद, इंजीनियरिंग इकाइयों और एमएसएमई सेक्टर का बड़ा केंद्र है। इसके अलावा यहां स्थापित उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की परियोजनाएं भी शहर के रणनीतिक महत्व को बढ़ाती हैं। वहीं  जैसे विश्वस्तरीय संस्थान ने कानपुर को शिक्षा और तकनीकी अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
ऐसे शहर को हाईस्पीड रेल नेटवर्क से बाहर रखना कई लोगों को समझ से परे लग रहा है। स्थानीय उद्योगपतियों का मानना है कि यदि बुलेट ट्रेन का उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना और बड़े शहरों को तेज परिवहन से जोड़ना है, तो कानपुर इस नेटवर्क का स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए था। दिल्ली-वाराणसी हाईस्पीड रेल कॉरिडोर के प्रस्तावित रूट में सराय काले खां, नोएडा, मथुरा, आगरा, इटावा, कन्नौज, लखनऊ, अयोध्या, रायबरेली, प्रयागराज, भदोही और वाराणसी जैसे स्टेशन शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं दिल्ली-सिलीगुड़ी कॉरिडोर लखनऊ, वाराणसी, पटना होते हुए पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी तक जाएगा। दोनों ही परियोजनाओं में कानपुर का नाम नहीं है। कानपुर और पूर्वोत्तर भारत के बीच लंबे समय से व्यापारिक संबंध रहे हैं। कानपुर से चमड़ा, रेडीमेड वस्त्र, प्लास्टिक सामान, मशीनरी और इंजीनियरिंग उत्पाद पूर्वोत्तर राज्यों तक भेजे जाते हैं। वहीं सिलीगुड़ी के माध्यम से चाय, मसाले, कृषि उत्पाद तथा नेपाल, भूटान और पूर्वोत्तर क्षेत्र से आने वाले अनेक उत्पाद उत्तर भारत के बाजारों तक पहुंचते हैं।

सिलीगुड़ी को पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यह पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। ऐसे में कानपुर जैसे औद्योगिक शहर को इस कॉरिडोर से जोड़ा जाता तो व्यापार, निवेश और लॉजिस्टिक्स के लिहाज से फायदेमंद होता कानपुर को बुलेट ट्रेन नेटवर्क से जोड़ने पर पूरे कानपुर मंडल, बुंदेलखंड और आसपास के जिलों को प्रत्यक्ष लाभ मिलता। स्वतंत्रता के बाद से कई राष्ट्रीय परियोजनाओं में कानपुर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के मामले में शहर खुद को लखनऊ और अन्य शहरों की तुलना में पीछे महसूस कर रहा है। ऐसे में बुलेट ट्रेन जैसी प्रतिष्ठित परियोजना से बाहर होना स्थानीय लोगों के लिए निराशा का कारण बन रहा है। फिलहाल इतना तय है कि देश में बुलेट ट्रेन के विस्तार की नई घोषणा के बीच कानपुर के हिस्से में फिर वही पुराना सवाल आया है—क्या विकास की रफ्तार में यह औद्योगिक महानगर एक बार फिर पीछे छूट गया?
"कनेक्टिविटी की कमी से पिछड़ता कानपुर"
कानपुर की उपेक्षा सिर्फ एक्सप्रेसवे तक सीमित नहीं है, बल्कि हवाई संपर्क के मामले में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। औद्योगिक और व्यापारिक दृष्टि से देश के दो सबसे महत्वपूर्ण शहर मुंबई और कोलकाता के लिए कानपुर से उड़ान सेवाएं शुरू होने के बावजूद उनकी अनियमितता के कारण यात्रियों को अक्सर लखनऊ का रुख करना पड़ता है। चमड़ा, होजरी, टेक्सटाइल, ज्वैलरी, फार्मा और इंजीनियरिंग उद्योगों से जुड़े व्यापारियों को डेढ़ से दो घंटे अतिरिक्त सफर कर लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचना पड़ता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। 
"उद्योग जगत की प्रतिक्रिया"
"आर के सफ्फड़" (महामंत्री यूपी डाइस एन्ड केमिकल मर्चेंट एशोसिएशन)
"कोलकाता चर्म उद्योग और रेडीमेड गारमेंट कारोबार का बड़ा केंद्र है। कानपुर के निर्यातकों और व्यापारियों का वहां से सीधा व्यावसायिक जुड़ाव है। दिल्ली-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन कॉरिडोर में कानपुर को शामिल किया जाता तो पूर्वी भारत के बाजारों तक पहुंच आसान होती, व्यापार बढ़ता और निर्यात क्षेत्र को नई ऊर्जा मिलती।"
प्रमोद सुराणा (महामंत्री नॉर्दर्न इंडिया होजरी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन)
"कानपुर को बुलेट ट्रेन नेटवर्क से बाहर रखना सिर्फ एक शहर की अनदेखी नहीं, बल्कि उद्योगों के हितों को भी प्रभावित करने वाला फैसला है। होजरी और इंजीनियरिंग उद्योग का बड़ा हिस्सा कोलकाता और पूर्वी भारत के बाजारों से जुड़ा है। यदि कानपुर को दिल्ली-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन कॉरिडोर से जोड़ा जाता तो व्यापारिक गतिविधियों को नई गति मिलती और उद्योगों को बड़ा लाभ मिलता।"



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