कानपुर : गलत के सामने कभी न झुकने वाली आवाज: अभय त्रिपाठी का संघर्ष, साहस और पत्रकारिता का सफर..

छात्र राजनीति से राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया तक—सच के लिए संघर्ष को बनाया जीवन का सिद्धांत

कानपुर। कुछ लोग पत्रकारिता को सिर्फ पेशा मानते हैं, कुछ इसे जिम्मेदारी समझते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए पत्रकारिता सच के पक्ष में खड़े होने और गलत के खिलाफ आवाज बुलंद करने का मिशन बन जाती है। वरिष्ठ पत्रकार अभय त्रिपाठी का सफर इसी तीसरी श्रेणी की कहानी कहता है।

कानपुर की धरती से छात्र राजनीति के संघर्ष के बीच सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले अभय त्रिपाठी ने समय के साथ पत्रकारिता में अपनी एक अलग पहचान बनाई। बेबाक तेवर, स्पष्ट सोच, निर्भीक आवाज, निष्पक्ष नजरिया और गलत के सामने समझौता न करने का स्वभाव उनकी सार्वजनिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।

आज वे UPtvLIVE के चेयरमैन, प्रबंध निदेशक एवं मुख्य संपादक के साथ-साथ राष्ट्रीय डिजिटल न्यूज़ चैनल TV99NEWS के संपादक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ पदों से नहीं, बल्कि उन संघर्षों से बनी है जिनमें उन्होंने पत्रकारों और जनहित से जुड़े मुद्दों के लिए आवाज उठाई।

चेहरे पर बेबाकी, शब्दों में धार और फैसलों में दृढ़ता

अभय त्रिपाठी की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता उनका स्पष्ट और बेबाक रवैया माना जाता है। सामने कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, मुद्दा यदि गलत है तो उसका विरोध करने में वे पीछे हटने वालों में नहीं रहे।

उनके व्यक्तित्व में एक खास तरह का क्रांतिकारी स्वभाव दिखाई देता है—ऐसा स्वभाव जो सवाल पूछने से नहीं डरता, दबाव में चुप नहीं रहता और असहमति को कमजोरी नहीं मानता।

उनकी पत्रकारिता का मूल मंत्र सरल है—

सच है तो उसके साथ खड़े रहो और गलत है तो उसके खिलाफ आवाज उठाओ।

यही सोच उनके पत्रकारिता जीवन के अलग-अलग संघर्षों में दिखाई देती रही है।

छात्र राजनीति ने सिखाया संघर्ष, पत्रकारिता ने दिया मंच

अभय त्रिपाठी के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। छात्र अधिकारों, युवाओं की समस्याओं और शैक्षणिक मुद्दों को लेकर उन्होंने आंदोलन और संघर्ष का रास्ता चुना।

सड़कों पर उतरकर विरोध करना हो, अधिकारियों के सामने सवाल रखना हो या युवाओं की आवाज को मजबूती से उठाना—छात्र राजनीति के दौर ने उन्हें जमीनी संघर्ष की भाषा सिखाई।

यही अनुभव आगे चलकर पत्रकारिता में उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

उन्होंने खबरों को सिर्फ पढ़ना नहीं सीखा, बल्कि खबर के पीछे खड़े व्यक्ति का दर्द और व्यवस्था के सामने खड़े सवाल को समझना सीखा।

पत्रकारिता में कदम रखा तो तेवर भी साथ लेकर आए

पत्रकारिता में आने के बाद उन्होंने अपनी पहचान किसी एक विचारधारा या सत्ता के साथ खड़े होकर नहीं, बल्कि मुद्दे के साथ खड़े होकर बनाने की कोशिश की।

सरकार हो, प्रशासन हो, राजनीतिक दल हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति—उनकी पत्रकारिता का दावा रहा कि खबर की कसौटी व्यक्ति नहीं, बल्कि तथ्य और जनहित होना चाहिए।

इसी कारण उनकी पहचान एक ऐसे पत्रकार के रूप में बनी, जो खबर को सिर्फ प्रकाशित करने के बजाय उसके असर और उसके पीछे छिपे सवाल को भी महत्व देता है।

UPtvLIVE: स्थानीय आवाज को डिजिटल ताकत

वर्ष 2018 में स्थापित UPtvLIVE उनके डिजिटल मीडिया सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

आज यह प्लेटफॉर्म उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, अपराध, सामाजिक मुद्दों और जमीनी खबरों को डिजिटल दर्शकों तक पहुंचाने वाला प्रमुख मंच बन चुका है।

अभय त्रिपाठी के नेतृत्व में UPtvLIVE ने डिजिटल मीडिया के बदलते दौर में अपनी पहुंच लगातार बढ़ाई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इसकी डिजिटल रीच 90 लाख से अधिक तक पहुंच चुकी है।

यह सिर्फ एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता मॉडल का विस्तार है जिसमें स्थानीय खबर को राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बनाने की क्षमता दिखाई देती है।

राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया में भी मजबूत मौजूदगी

क्षेत्रीय पत्रकारिता से आगे बढ़ते हुए अभय त्रिपाठी ने राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया में भी अपनी भूमिका स्थापित की।

TV99NEWS के संपादक के रूप में वे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को दर्शकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

उनके नेतृत्व और संपादकीय अनुभव ने उन्हें स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक पत्रकारिता की व्यापक समझ विकसित करने का अवसर दिया है।

2016: जंतर-मंतर पर पत्रकारों की बुलंद आवाज

अभय त्रिपाठी के संघर्षपूर्ण पत्रकारिता जीवन में वर्ष 2016 एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा।

DAVP नीति विरोधी मंच के उत्तर प्रदेश संयोजक के रूप में उन्होंने छोटे और मझोले समाचार पत्रों से जुड़े संपादकों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

8 अगस्त 2016 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित आंदोलन में देशभर से बड़ी संख्या में संपादक और पत्रकार जुटे।

यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उन छोटे समाचार पत्रों की आवाज थी, जो बड़े मीडिया संस्थानों के बीच अपने अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे।

इस आंदोलन ने अभय त्रिपाठी की संगठन क्षमता, नेतृत्व और संघर्षशील स्वभाव को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

नवीन गुप्ता हत्याकांड: पत्रकार के लिए पत्रकार सड़क पर उतरा

वर्ष 2017 में बिल्हौर के पत्रकार नवीन गुप्ता की हत्या ने पूरे पत्रकार समाज को झकझोर दिया।

इस घटना के बाद अभय त्रिपाठी ने पत्रकारों के साथ मिलकर न्याय की मांग को लेकर संघर्ष शुरू किया।

कानपुर जर्नलिस्ट क्लब के बैनर तले आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया गया। उद्देश्य साफ था—पत्रकार की हत्या का न्याय और पत्रकारों की सुरक्षा।

मामला विधानसभा से लेकर राज्यसभा तक पहुंचा। लगातार उठाई गई आवाज के बीच आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और पीड़ित परिवार को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी मिली।

इस पूरे संघर्ष ने अभय त्रिपाठी की उस छवि को और मजबूत किया जिसमें वे अपने साथी पत्रकार के लिए भी सत्ता और व्यवस्था के सामने खड़े होने से पीछे नहीं हटते।

पत्रकारों की आवाज बनना सिर्फ नारा नहीं, जिम्मेदारी

कानपुर जर्नलिस्ट क्लब के महामंत्री के रूप में अभय त्रिपाठी ने पत्रकारों से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया।

पत्रकारों की सुरक्षा हो, सम्मान का सवाल हो, प्रशासनिक स्तर पर किसी पत्रकार को परेशानी हो या किसी साथी पत्रकार के अधिकार की बात हो—वे संगठनात्मक मंच पर आवाज उठाने के पक्षधर रहे हैं।

उनकी सोच में पत्रकारिता की ताकत सिर्फ कैमरे और कलम में नहीं, बल्कि संगठन और एकजुटता में भी है।

पत्रकारिता को संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग

पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर पत्रकारिता को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की मांग भी उठाई।

यह पहल इस सोच को दर्शाती है कि पत्रकारों की समस्याओं का समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि नीतिगत और संस्थागत स्तर पर भी होना चाहिए।

उनके लिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल बहस का विषय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ा सवाल है।

विरोध, आरोप और जांच—लेकिन झुकने का रास्ता नहीं

बेबाक पत्रकारिता की राह आसान नहीं होती। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ति को समर्थन के साथ विरोध और आरोपों का भी सामना करना पड़ता है।

अभय त्रिपाठी के खिलाफ भी एक दौर में शिकायत और गंभीर आरोप सामने आए। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया और जांच के बाद आरोपों को बेबुनियाद पाया गया।

उनके समर्थकों के लिए यह घटना इस बात का उदाहरण बनी कि आरोपों के शोर से ज्यादा महत्वपूर्ण जांच में सामने आया तथ्य होता है।

पद से बड़ी पहचान—संघर्षशील पत्रकार

अभय त्रिपाठी की पहचान सिर्फ उनके पदों से नहीं होती।

उनकी पहचान उस तेवर से होती है जिसमें सवाल पूछने का साहस है, सच के साथ खड़े होने का संकल्प है और गलत के सामने झुकने से इनकार है।

छात्र राजनीति से निकला संघर्षशील युवा आगे चलकर पत्रकार बना, पत्रकार से संगठनकर्ता बना और संगठनकर्ता से डिजिटल मीडिया का नेतृत्व करने वाला चेहरा।

यह सफर बताता है कि पत्रकारिता की असली ताकत केवल बड़ी स्क्रीन, बड़ी पहुंच या बड़े संस्थान में नहीं होती।

असली ताकत उस आवाज में होती है, जो दबाव में भी अपनी बात कह सके।

करोड़ों तक पहुंचती खबरें, लेकिन तेवर वही

डिजिटल मीडिया ने भले ही अभय त्रिपाठी की पहुंच को लाखों दर्शकों तक पहुंचा दिया हो, लेकिन उनकी कार्यशैली का मूल स्वर अब भी वही है—जनता के सवाल, व्यवस्था से सवाल और सच के पक्ष में खड़े होने का साहस।

उनके लिए पत्रकारिता का अर्थ केवल ब्रेकिंग न्यूज देना नहीं, बल्कि उन मुद्दों को सामने लाना भी है जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा हो।

एक नाम, कई पहचान

छात्र नेता।
संघर्षशील पत्रकार।
संगठनकर्ता।
पत्रकार हितों की आवाज।
डिजिटल मीडिया उद्यमी।
संपादक।
और सबसे बढ़कर—सवाल पूछने वाला पत्रकार।

अभय त्रिपाठी का सफर अभी जारी है।

कानपुर की छात्र राजनीति से शुरू हुई यह यात्रा आज राष्ट्रीय डिजिटल मीडिया तक पहुंच चुकी है। लेकिन इस सफर की सबसे बड़ी खासियत शायद यही है कि मंच बदलते रहे, जिम्मेदारियां बढ़ती रहीं, पहुंच लाखों तक पहुंच गई—लेकिन गलत के सामने न झुकने का तेवर कायम रहा।

क्योंकि पत्रकारिता उनके लिए सिर्फ खबर नहीं—

सच की आवाज है।
अन्याय के खिलाफ संघर्ष है।
और लोकतंत्र में जनता के सवाल को बुलंद रखने की जिम्मेदारी है।

यही अभय त्रिपाठी की पहचान है—बेबाक पत्रकार, निर्भीक आवाज और पत्रकारों के हक के लिए संघर्ष करने वाला चेहरा।

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