गंगा किनारे कानपुर, एक्सप्रेसवे से बेगाना, नीतियों की अनदेखी ने तोड़ी औद्योगिक रफ्तार, ‘मिसिंग लिंक’ बना शहर...
अभय त्रिपाठी
कानपुर, उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नक्शे पर कभी सबसे मजबूत कड़ी रहा कानपुर आज विकास की सबसे अहम दौड़—एक्सप्रेसवे कनेक्टिविटी—में हाशिए पर खड़ा दिखाई दे रहा है। गंगा किनारे बसे इस शहर की विडंबना यह है कि प्रदेश में एक्सप्रेसवे का जाल बिछा, लेकिन कानपुर उससे लगभग कटा रह गया।
पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के तहत आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और गंगा एक्सप्रेसवे जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी। लेकिन इन सबके बीच *कानपुर एक “ब्लाइंड स्पॉट” बनकर रह गया।*
2016 में बने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे कानपुर से जुड़ा है, लेकिन हकीकत में यह कनेक्शन शहर से 54 किलोमीटर दूर अरौल के पास खत्म हो जाता है। यानी उद्योगों को पहले जर्जर सड़कों पर जाम से जूझते हुए एक्सप्रेसवे तक पहुंचना पड़ता है—जहां समय और लागत दोनों दोगुने हो जाते हैं।
बहुप्रतीक्षित "लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे" भी उम्मीद से ज्यादा भ्रम साबित होता दिख रहा है। नाम में कानपुर जरूर है, लेकिन इसका ट्रेस उन्नाव के आजाद मार्ग चौराहा तक सीमित है। जो सरैयापुल के निर्माण के बाद भी उन्नाव के ट्रांसगंगा सिटी तक होगा। सवाल सीधा है—क्या यह प्रोजेक्ट कानपुर को जोड़ेगा या सिर्फ उसके नाम का इस्तेमाल करेगा?
सबसे बड़ी चूक गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर मानी जा रही है। देश के सबसे लंबे एक्सप्रेसवे में शामिल इस परियोजना से कानपुर को सीधे नहीं जोड़ना विशेषज्ञों के मुताबिक एक रणनीतिक गलती है। अगर यह कनेक्शन होता, तो कानपुर उत्तर भारत का बड़ा लॉजिस्टिक हब बन सकता था।
इस कनेक्टिविटी गैप का असर अब साफ दिख रहा है।
उद्योगों की ट्रांसपोर्ट लागत लगातार बढ़ रही है
माल की डिलीवरी में देरी हो रही है
निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ रही है
*एक समय “ईस्ट का मैनचेस्टर” कहलाने वाला कानपुर अब इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से जूझता नजर आ रहा है।*
जहां लखनऊ और नोएडा एक्सप्रेसवे के सहारे निवेश का केंद्र बन चुके हैं, वहीं कानपुर में नए निवेशक कदम रखने से हिचक रहे हैं। कई उद्योगपति अपनी यूनिट्स कानपुर से शिफ्ट कर चुके है और कई करने की प्लानिंग कर रहे है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ भूगोल की नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की विफलता है। पिछले कई दशको में सरकारें बदलीं, योजनाएं बदलीं, लेकिन कानपुर की स्थिति जस की तस रही।
कानपुर की कहानी अब सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि उस चूक की है जहां इंफ्रास्ट्रक्चर की एक कमी पूरे औद्योगिक भविष्य को प्रभावित कर रही है। अगर अब भी कनेक्टिविटी पर निर्णायक फैसले नहीं लिए गए, तो गंगा किनारे बसा यह शहर विकास की मुख्यधारा से स्थायी रूप से कट सकता है।
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